चुनाव

राजनीति के अस्तबल में

गहरी हलचल है

गहमागहमी है

मुद्दे पर मुद्दे हुंकार भर रहे हैं ।

पदयात्रा में जय-जयकार है

रोड़ शो की हवा जोरदार है

रैली में भाषण धारदार है

कार्यकर्त्ता बड़े वफादार है

झंडे डंडे और हथकंडे सब की बहार है ।

हवा में शोर है

नेता बड़ा चोर है

दाम है तो काम है

सीधा सा फंडा है

वरना तो डंडा है

चेहरा शानदार है

पाकेट वजनदार है

नोट है तो वोट है

डंके की चोट है ।

जीत और हार में

एक ही बात है

पक्ष में विपक्ष में

होते सभी काम हैं

हर तरफ लूट है

बाकी सब झूठ है

वादे है इरादे है

पूरे हैं आधे है

नेक हैं अनेक हैं

घोषणाओं की रेल पेल है

रास्ते में मझधार में

नेता सदाबहार है ।

चुनने का संकट है

संकट पर संकट है

सोचकर विचार कर

राह की तलाश कर

सब तेरे साथ हैं

सब तेरे हाथ है

नारों की फुरफुरी से

ऊपर निकल कर

सत्य का संधान कर

चुनाव कर चुनाव कर

सही से चुनाव कर ।

अभिमंत्रित

मैं सुबह से शाम तक

चलता रहता हूं मंत्र बिद्ध सा

भटका भटका सा

ठिठका ठिठका सा

कुछ अव्यक्त सा

अनचीन्हा सा खोज रहा हूं ।

भाव अभाव

शब्दों के कोश में

कसमसाते शब्द

अभिव्यक्ति के लिए बाट जोह रहे हैं ।

जो मैंने कहा वह

हवा में तैरता रहा

सम्प्रेषित नहीं हुआ ।

आंखें जो कह रही थी

वो होंठों ने कहा नहीं

कानों ने वो सुना

जो मैंनें कहा ही नहीं ।

यूंही इच्छित सुनने की प्रतीक्षा में

कब से खड़ा हूं ।

शब्दों के दूसरी तरफ खड़े

व्यक्ति के पास

असमंजस का पहाड़ा है।

भाव और अभाव की दुविधा में

घिरे हर व्यक्ति के पास

उलाहनों का अम्बार है ।

प्यार में विश्लेषण

तर्क का पैमाना

भाव का अभाव है ।

कानों में कोई निराश गीत

गूंज रहा है ।

मायानगरी १

हे उद्धव

दामोदर दास का साथ छोड़कर

वीर सावरकर की सौगंध भूलकर

कहां भटक गये हो ।

गोपियों और ग्वालबाल संग

जो प्रेम भक्ति का गीत गाया था

कहां बिसरा दिया वो

मायानगरी

हे उद्धव !

मायानगरी के सिंहासन के

मोहपाश में आबद्ध

तुम्हारी आंखों पर

कैसा आवृत है ये

कि तुम देवेन्द्र , नरेंद्र

कि सत्संगति और

शाह कीअमित

मंत्रणा का त्याग कर

शरद और सोनिया के

कुटिल कुचक्र में फंसे

जरासंध की सभा में

मिले सम्मान से इतरा रहे हो।

अनंत

खुले आसमान की ओर

निहारती है आंखें

दोनों हाथों से सम्पूर्ण आसमान को

घेर लेने की आकांक्षा से

हवा सी चंचलता से सरोबार

मैं कुछ नया नया सा

एक ताजा सा अनुभव समेट

लेना चाहता हूं ।

एक खालीपन ने

घेर लिया है

निरूत्तर सा

अबूझा सा

दिशाहीन सा

निशब्द सा

प्रश्नहीन सा

संकटग्रस्त सा

बस यूंही निहारता हूं

खुले आसमान को

जहां संभावनाओं की

अनंत खिड़कियां खुलती हैं

मेरे लिए भी खुली हो शायद ।

किसान

फूल की पंखुड़ियों की तरह

बिखर जाऊंगा रेशा रेशा

अपने खेत की मिट्टी में

मिल जाऊंगा खाद की तरह

रेत में रेत बन जाऊंगा ।

अपना शरीर को पसीने में

पानी पानी कर कर के

सूख जाऊंगा सूखे पत्ते सा

टूटकर बिखर जाऊंगा रेत सा ।

फिर नया अंकुर बन कर

तन खड़ा हो जाऊंगा

सारी खरपतवार के बीच से

सांस खींच कर लहलहा उठूंगा ।

चमचमाती फसल की चमक सा

खिलखिलाकर प्रकट हो जाऊंगा

अपने पिता -पितामह की तरह

राष्ट्र सेवा मानव सेवा के लिए उत्सर्ग हो जाऊंगा ।