हलचल

आसमान में हलचल

बादलों की आवाजाही चल रही है

काले भूरे छोटे मोटे लंबे पतले

बादल ही बादल हैं हर ओर

हजारों हजार आखें देखती है

उम्मीद लगाए निहार रहे हैं ।

बिना बरसें निकल गये बादल

आखों में अतृप्ति ठहर गयी है

नही हो पा रही है फसलों की बुआई

खेतों में खडे़ किसान

बस इंतजार…..

ठहरा सा गया है सपनों का सफर

सुना है अलनी़नो ने बादलों को रिझा लिया है

अलनीनो़ कातिल फि़ंरंगी नायिका ।

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सफ़र

राह तकता रहा दिन बदलता रहा

पर तेरी चाहत का सफ़र बाकी है।

चला हूँ तेरी राहों में सालों साल

तुझ से उम्मीदों का सफ़र बाकी है।

बात चली चलती गयी मयखाने में

बातों का सिलसिला अभी बाकी है ।

उदास हूँ उदासियों ने घेर लिया

मुहब्बत की रौशनी का सफर बाकी है ।

खिड़कियाँ

खोल दो खिड़कियाँ

आने दो ताजी हवा

आसमान के खुलेपन को

समेटना है मुझे ।

आसमान से जुड़ी है

धरती पर फैली हरियाली

उर्ध्वमुखी ऊर्जा का वितान

मैं उसके स्पर्श पाश में आबद्ध हो

डूब जाना चाहता हूँ इस सुख सागर में ।

माँ

तुम समय के प्रवाह में

बह गयी हवा सी

मैं खडा़ निहारता रह गया

तुम अभी थी

अभी नही हो

निश्चेष्ट तुम्हारी देह

प्राण तत्व निकल गया

किसी अंजान यात्रा पर ।

माँ ,……।माँ ,….।।

मैं पुकारता रह गया

खाली हाथ खडा़ रह गया

कुछ समझ नही पा रहा हूँ

करूँ तो क्या करूं

दिशाहीन सा भ्रमित सा ।

क्रियाक्रम की रस्में निभाकर

सगे संबधियों के बीच

अकेला सा, खोया खोया सा

खड़ा हूँ

धीरे धीरे सब लौट गये हैं

सन्नाटा है घर मैं ।

माँ मुझे घर में हर ओर दिखती है

माँ मेरे विचारों में विद्यमान

माँ मेरे अस्तित्व का हिस्सा

माँ है तो मैं हूँ ।

करवट

मैं फिर लौट आऊगां

बादलों की तरह

गरज गरज कर

अपनी प्रेम वर्षा करने ।

हवाएँ सारी तपन सोख लेगीं

मंद मंद सहलाती सी

चाहतों को जगाती हुई

मिठास घोलती सी

आगे बढ़ जाएगी ।

मिट्टी मे छिपी महक सी

तुम यही हो

मेरे अंतर्मन की प्यास …..

सूखी नदी

गर्मी से सूख गयी नदी

अब उसमें बहता नही जल

नदी अपने अस्तित्व के लिए

लड़ रही है ।

आते जाते लोग उसमें फेकतें हैं

अपने घर का कूड़ा

टूटा फूटा सामान ।

टूटी इमारतों का मलबा

शहर का कीच कांदों

इसी में समाता है ।

चोरी चोरी इसकी रेत

चोरी हो जाती है

कोई गोल गोल चमकीले

पत्थर चुराता है ।

नदी रोती है

अपनी मृत देह को निहारती है

छिछले पानी के गड्ढों में

मछलियाँ अपनी आखिरी जंग के लिए

तैयार हो रही है ।

मानसून में नदी ने देखा है

भावनाओं का ज्वार

यौवन की उद्दाम लालसाओं का

आलोड़न विलोड़न

गहरे घुमावदार भंवर ।

शरद के शांत परिवेश में

सौम्यता को परिभाषित करती नदी

सहज, शांत ,स्वच्छ ,निर्मल

जीवनदायनी बनकर रस संचार करती है ।

एक क्षण

बहुत कुछ था यादों के दरम्यान

अंधेरी रातों में मशाल बन गया ।

कहूं या न कहूं इसी कशमकश में

गुजर गये साल दर साल

न फिर हम मिलें न वो बात हुई ।

बस वही एक क्षण था जो गुजर गया

घास की पत्तियाँ तोड़ते तोड़ते

इधर देखा उधर देखा ,बस उसे ना देखा

जिसको दैखने की चाहत में बहुत सी शामें गुजार दी ।