नई पहचान

आओ फिर से मिलें

अनजान लोगों की तरह

एक दूसरे को जानने

की जिज्ञासा के साथ

वो पहले पहल मिलने की

ताजगी लिए हुए ।

बहुत सारे प्रश्नों को

मन ही मन दोहराते हुए

कंपकंपाते होंठों पर

दिल की धड़कनें लरजती सी

व्यक्त हो कर भी अव्यक्त सी

रह जाएं सुनकर भी अनसुनी सी

देखूं जी भरकर फिर भी अदेखा

रह जाएं तुम्हारे चेहरे का बांकपन

बार बार मिलने की इच्छा से

उदीप्त रहे आंखें

नींद उड़ जाएं और

तू ही तू नज़र आए ।

बहक जाऊं

चलो बहक जाऊं थोड़ा

हवा के संग संग

हो जाऊं थोड़ा आवारा

बिखर जाऊं थोड़ा सा

समेट लूं बदगुमानियां थोड़ी सी

धूप संग थोड़ा तप लूं

जुबान में टेढ़ापन

नीयत में पलट जाऊं

दोपहर सा जुलसाऊं

लूं की तरहां

सांझ संग अतरंगी

पी कर लड़खड़ा लूं थोड़ा

जी भर कर कोस लूं

ज़माने भर को

थोड़ा सा बदनाम हो जाऊं

उतार दूं भलेपन का लबादा

थोड़ा सा अंधेरे का हमनाम हो जाऊं

बहुत रह लिया सयाना बनकर

थोड़ा अनाड़ी हो कर ही

शायद उसे नजर आऊं।

जयघोष

अपने अपने घरों में बंद

जरुर हैं हम सब

पर अकेले नहीं हैं

इस लड़ाई में सब शामिल है

करोना की लड़ाई कुछ अलग है

अलगाव और एक दूसरे से दूरी बनाकर ही

इसे जीत पाएंगे हम ।

करोना ने एक नई पहचान दी है

दूरी और अलगाव को

पुराने और दकियानूसी कहे जाने वाले

कुछ संस्कार फिर प्रासंगिक हो उठे हैं

यह भारतीय संस्कृति का जयघोष है ।

पीड़

कितने ही पशु- पक्षियों को

तुम जीवित ही चबा गये

यौन शक्ति बढ़ाने के निमित्त

तुम पशुत्व से भी नीचे गिर गये ।

तुम्हारी पशुता को देने ज़बाब
प्रकृति ने किया है प्रहार

एक छोटा सा वायरस छोड़ दिया है

तुम्हारी औकात दिखाने के लिए

समझ सकते हो तो समझ जाओ

नहीं तो होगा सर्वनाश ।

एक डर

एक डर बज़बज़ा रहा है

सुनसान पड़ी सड़क पर

ना कोई आ रहा है

ना कोई जा रहा है

सूखे पत्ते हवा में

उड़ रहे हैं कभी इधर कभी उधर

बस उन्हीं की आवाज सुनाई देती है

इस उदास शाम के बीच

उतरती शाम के संग संग

उतर रही है लाकडाउन की छायाएं

मुंह ढांपकर अबोले से उतरते हैं

इक्का दुक्का छितराए से

दूरी बनाते ,बचते बचाते से लोग

अपार्टमेंट के बाहर खड़े हाकर से

फल सब्जी खरीदने ।

यूंही लोग हवा की तरह

बातों का रंग बदलते देखते है

साम्यवादी चीन की करतूत है ये

ना भाई ,ना

ये तो तब्लीग़ी जमात़ का करनामा है

बहस और आरोपों-प्रत्यारोपों के

टीवी कार्यक्रम से बाहर

हर व्यक्ति अकेला खड़ा है

लम्बी होती अपनी छाया के संग ।

शहर में अफवाहों का बाज़ार सजता है
व्हाट्स अप पर एक ग्रुप से

दूसरे ग्रुप तक सनसनी मचा कर

फल मत खरीदना उस दाढ़ी वाले से

जो बदनीयती का थूक लगाता है

बीमारी फैलाता है

धर्म की टोपी पहनकर

अधर्म का बाज़ार सजाता है ।

दुर्भावनावों की दुर्गंध से

बड़ी होती है सद्भावनाओं की सुगंध

हर कुत्सित इरादों को नाकाम कर

सदाशयता अपनी चाल चलती है

सहज ही जीवन सधे कदम चलता है

हर बीमारी के बाद

ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार चलती है

तमाम घबराहटों को नाकाम कर

करोना से आगे निकल ।

धैर्य

सूर्योदय से सूर्यास्त तक

हमने हर रंग को जिया है

शुद्ध स्वच्छ निर्मल अमृतमयी हवा का

एक एक घूंट शांत मनोभाव से पिया है ।

लाकडाऊन की इस अभूतपूर्व घड़ी में

जब देश में भय और शंकाओं की घटा

अफवाहों के काले बादल घिर गए हैं

फिर भी धैर्य से देश एकजुट खड़ा है

हवा का रुख बदलने वाला है

सब एक ही गीत गा रहें हैं

हम होंगे कामयाब एक दिन

दुश्मनों की शैतानी चालों को

समझ लिया है हमने

मिलजुल कर हम हर मुसीबत से

टकरायेंगे और संकटों से बाहर आएंगे ।

अवसर

जब कऱोना से डर कर

घरों में दुबक गए हैं लोग

सरकारी आदेशों का लबादा ओढ़कर

तब मेरे जैसे जाहिल लोग

शहर की सड़कों पर भागे फिर रहे हैं

सब्जियों की , फलों की, दूध की आपूर्ति करते हुए

हमें कोई डर नहीं डराता

भूख के डर से कोई डर बड़ा नहीं होता

भूख ने मुझे निडर बना दिया है ।

तुम दुबक सकते हो टीवी की रंगीन दुनिया में

विज्ञापनों की ईत्र से लकदक नायिका के सपनों के साथ

सरकारी आदेशों को तुमने अपनी सुविधा के लिए बुना है

तुम्हारे लिए चलती है मैट्रो और हवाई जहाज

मैं तो बस के लिए भी तरसाया जाता हूं

पर क्या मैं ठहरा हूं ?

मुझे अपने पैरों पर भरोसा है

मैं मीलों को दूरी को हवा की गति से उड़ता हूं

मरना तो है ही एक दिन

पर मैं चलते चलते ही मरूंगा

मैं अपने लिए नहीं तुम्हारे लिए मरूंगा ।

मेरी धोती और मेरी चादर ही मेरी पताका हैं

खुले आसमान के नीचे

तुम्हारे डर को एक अवसर मानकर

मैं निकल आया हूं

जीवन की उत्कट लालसा की पतवार थामकर

अंतिम लड़ाई के लिए तत्पर होकर

अगर विजयी हुआ तो तुम मुझे सलाम करोगे ।

स्वच्छ आकाश

बहुत दिनों बाद हुआ है

स्वच्छ नीला आकाश

हवा कितनी साफ साफ

जैसे सुगंध से भरी हो

धूप एकदम खिली खिली

सद्यस्नात नायिका के मुखमंडल सी

सब कुछ कितना निर्मल पारदर्शी

पेड़ कितने स्वच्छ जागे जागे से

बस निहारते ही रहे अपलक

पर हम इसे लाए नहीं

ये एक भय ,संशय और आतंक से जन्मा है ।

होली ये कैसी हो ली

देश जब वसंत के रंगों

में रंगा हुआ था

हर ओर रंगोत्सव चल रहा था

फूलों की खुशबू हर ओर छाई थी

हर मन प्रफुल्लित था होली नजदीक आई थी

गीत और संगीत की महफ़िल सजाने की तैयारी थी

तब दिल्ली में कुछ लोग नफरत की साज़िश में

दिन रात पत्थर , पैट्रोल बम,गोली बारूद सजा रहे थे

फिर खेला गया खूनी खेल

इंसानियत की अर्थी निकली

खेली खून की होली

मानवता हुई शर्मसार

गली गली फैला पडा़ है

नफरत का सामान

लंगड़ाती चल रही है जिंदगी

टूटी हुई बैशाखी के सहारे

कुछ है जो खो गया

नफरत की आग में

जलते मकानों दुकानों संग

टूटी हुई चारपाई , मेज,कुर्सी के पास

एक गमला भी टूटा है

जिस पर लिखा है विश्वास

फिर भी पौधे में निकल आई है

छोटी-छोटी क ई कलियां गुलाब की

फिर विश्वास की फसलें उगेगीं

फिर गली में उडे़गा गुलाल

फिर मन करेगा पड़ोसी को दुआ सलाम ।