धुंध

ठिठक गये हैं कदम

रास्तों में

गहरी धुंध छाई है ।

शर्मीली सी

हठीली सी

अबूझ सी

दिशाओं ने

ओढ लिया है

धुंध का घूंघट ।

दिग्भ्रमित सा

खड़ा हूँ

प्रतीक्षा में

निश्शब्द ।

Advertisements

नव वर्ष

नव वर्ष के स्वागत में

हाथ उठाकर ,बाहें फैलाकर

खड़े हैं लोग ।

सद् भावनाओं के संदेशों में भावविभोर

Happy New Year गा रहे हैं

थिरक रहे हैं संगीत की धुन पर

उन्मत हो रहे हैं

सुरा के घालमेल ने

बहका दिए हैं उनके कदम

कुछ नया करने के लिए

हवाई फायर कर रहे हैं

किसी को घायल

गिरते देख

लड़खड़ाते कदमों से छिपने को

जा रहे हैं

सलाखों के पीछे बैठकर

नये वर्ष को गाली दे रहे हैं ।

नये वर्ष में केलैन्डर के

बदल जाने के सिवा

क्या था नया ?

सुबह सुर्खियों में अलबता यह जरुर था

शराब पी कर गाड़ी चलाने पर

6548 चालान किए गये ।

सूर्य फिर निकला पूर्व से

धुंधलके और प्रदूषण की चादर ओढकर

फिर शहर ने देखा गली गली

गंदगी का ढेर

फिर शहर की सड़कों पर लगा जाम

फिर आम आदमी निकला

करने रोजी रोटी की तलाश

फिर किसी गरीब की अस्मत हुई तार तार

नेताजी ने बेघर लोगों को कम्बल बांटे

फिर उनका फोटो छपा

समाचार के मुखपृष्ट पर

पहने हुए नोटों का हार

फिर कह रहे है

खुश रहो खुशियाँ बाँटों

नये साल का जश्न है यार ।

बीतता साल

2018 के अंतिम कुछ घंटे

पीछे मुड़कर देखने की चाहत है

बहुत कुछ घटित हो गया

हो गया इतिहास

एक नये तरह का देश का हाल

संकट के संशय में जीता हुआ देश

संकीर्ण होती विचार की दुनिया ।

तुम

बंदिशों से ज़िदगी यूँ तार तार हो गयी

मैं न बोला ,तू न बोली,हँसी सारी खो गयी ।

याद करके तुमको,रोया हूँ मैं बार बार

आँख में पानी नहीं अब,भर गया गर्द गुबार ।

शहर भर में चली चर्चा,तेरे हुस्न मेरे प्यार की

रौशनी का दरिया है तू,मैं ठहरी हुई रफ्तार हूँ ।

उदासीन

मैंने खुद को तन्हा कर लिया

बंद कर लिया दरवाजे को

हवा से भी डर लगता है

आँखें बचा कर

निपट अकेला हो गया हूँ ।

कोमल भावनाओं को

प्रकट करने से बच

सुरक्षित रहने के लिए

कभी कभी उदासीन होना

निहायत जरुरी लगता है।

पिता

साईकिल सवार एक व्यक्ति

शहर की सड़कों पर

संकोच से भरा

फुटपाथ के साथ साथ

डरता सा चल रहा है ।

बेटी को स्कूल छोड़ने जाता पिता

उसके मासूम सवालों से घिरा

हमारे पास क्यों नहीं है

स्कूटी ,बाईक ,कार

असंतोष की आग मे जलता

जमाने भर को

मन ही मन गाली देता

चुपचाप आगे बढ़ता है ।

एक लम्बे मौन के बाद

बेटी के उदास चेहरे पर

नजर डालते हुए कहता है

पढने से सब होता है

पढने से सब होता है

मैं पढा़ई से भागा

इसलिए हूँ अभागा

तुमको आगे बढना है

तो मन लगाकर पढना है

बेटी को सुनहरे सपनों की

दुनिया में ले जाता पिता

सद्कामनाओं से सरोबार होता है

मन में हताशा और निराशा है

बेटी के मन में संभानाओं के

बीज बोता है

बचपन सपनों के पंखों से

उड़ान लेता है

हर पिता अपने बासी सपनों को

अपने बच्चों की

ऊर्जामयी आखों में संजोता है

पिता का मन ममता से सरसराता है

अपनी बदहाली पर

गीत नया गाता है ।

प्रदूषण में “दिल्ली”

राजधानी में घनघोर अंधेरों का बसेरा

दिन में भी है चमकते उजाले की चाह

सूरज के दरश को

तरसती आखें हैं

सिकुड़ती हवा है यहाँ

लोग नाक भौंह चिढाते से

मुँह पर पट्टी लगाए

किसी छूत की बीमारी से सावधान ।

रेडियों ,टी.वी.,समाचारपत्र

प्रदूषण के खतरों की

सूचना का आतंक फैलाते

पैसा बटोर रहे हैं ।

सभी संवैधानिक संस्थाएं

खतरों से सावधान

उदघोषणाओं पर उदघोषणा करती

बदलती नियम उपनियम

अपनी सीमाओं में बंधी

अपने बोझ को

दूसरों के कंधै उतारती

प्रदूषण के नाम पर

छुट्टियों का लुत्फ उठाकर

एयर प्यूरिफायर तले

आराम फरमा रही हैं ।

सुबह शाम पाँच तारा होटलों में

चर्चा होती है

प्रदूषण पर लम्बी बहस के बाद

बन्द कमरों में

चलता है क्लोज ग्रुप इंटरटेंमेंट

शुद्ध मनोरंजन प्रदूषण मुक्त

अगले दिन समाचार बनता है

कांफ्रेंस का बिल

हर तरह.से जमा घटा करके

प्रति व्यक्ति पचास हजार

प्रदूषण मुक्ति के लिए

ये कीमत

ज्यादा नहीं है ।