सन्नाटे के बीच

एक सहमी हुई लड़की

जब चलती है सन्नाटे के बीच

अपनी उपस्थिति को नकारते हुए

सन्नाटे में विलीन होने को
सन्नाटे को ओढ़कर ।

कितना कठिन है
यह जानना कि

झूठी जीत के आगे हार खड़ी है
वह सधे कदम चलती है
प्यारे के प्यार पगी ।

उसे विश्वास नहीं है

प्यार के सतरंगी सपनों के अहसास का

रिक्तता के बोध से भर जाना

वह समझने को तैयार नहीं

उदासी की इबारत को
जो हर रोज बुनी जाती है

उसके चारों ओर।

खबरों में रोज आती है

कुछ बदनसीब लड़कियां

सपनों के सतरंगी पायदान पर खड़ी होकर
जब वे थामती हैं हाथ

नये रास्ते पर जाने का
दुस्साहस का कवच पहनकर

तो फिसल जाती हैं

अंधेरे कमरे के सन्नाटे में

जहां कुछ सम्भावित दुर्घटनाएं
उसकी राह तक रही हैं।

उसकी चिल्लाहटें
टांगों के बीच मुंह छिपाकर
सुहागरात का सपना

तार तार होते देखती हैं

उसे याद आती है

मां की सीख
जिसे उसने यूंही

उड़ा दिया

हवा का बेमौसमी

झोंका समझकर ।
रक्त पात का शिकार

उसका कौमार्य
महज एक खबर भर है

जो पुलसिया डायरी में

अन्तिम पृष्ठ पर

लिखी जाती हैं

उखाड़ फेंकने के लिए।

नेता

चुनाव की हलचल है
हाथ जोड़े चलता है
झुकता है

चरण स्पर्श करता है
माता जी, पिताजी

बहिन जी ,भाई जी
सबसे बड़े सम्मान से मिलता है।

सबका मिला साथ

बन कर प्रधान

सत्ता की हनक में
कंधा चौड़ा कर चलता है

ऐंठी हुई रस्सी सा अकड़ता है
फ़ालतू सा फुदकता है।

देखता इधर है

बात उधर करता है
आदमी को आदमी नहीं

गधे सा गिनता है
लकदक सफेद पर

कल्फ़ की खड़ खड़ है

जूते पर क्रीम पालिश की
चमक चम चम है।

सपने

हमारे तुम्हारे सपने

अधपके ,कच्चे कच्चे
बनते रहे, बिगड़ते रहे
आकाश में उड़ान भरते

धरा पर विचरण करते

सपने हमारे तुम्हारे ।

नहीं सोचा था

यूं ही बन्द रह जाएंगे

पलकों में सिमट कर
दूर चले जाएंगे

राह बदल जाएंगे

बात होगी जब कभी

बात बदल जाएंगे

सपने हमारे तुम्हारे सपने।

देखेंगे और अदेखा कर

आगे बढ़ जाएंगे

आंखों की हसरतों को
हवा में उड़ायेंगे
हूक सी उठेगी तो
किस को बताएंगे

खुद को समझायेंगे

सपने हमारे तुम्हारे सपने।

चांद की चमक सी तुम
खुशबू बसन्त की तुम
मादकता से सरोबार

आम की झुकी सी डाल
मेरे मन आंगन
तुम्हीं रची तुम्हीं बसी
भूल नहीं पाया हूं
भूल नहीं पाऊंगा
मेरी सपन सुंदरी

गले मिलो एक बार

सपने हजार हजार
करो कभी तो साकार

सपने हमारे तुम्हारे सपने।

गंगा

एक गहरा आकर्षण है

गंगा के जल में

हम खिंचे चले आते हैं

गंगा की लहरों को एकटक
निहारते रहने के लिए

सुबह सुबह गंगा तट पर

टहलने के लिए मीलों पैदल

चलकर ,आचमन करता हूं ।

ऋषिकेश और हरिद्वार में

गंगा आरती का भव्य आयोजन

हजारों लोगों का समवेत गायन

आस्था का नया संस्करण

जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार

जल में प्रवाहित होते सांध्य दीप
आंखों में नयी चमक भरते हैं ।

उतुंग पर्वत श्रृंखलाएं

निमंत्रण सा देती हैं

शिवशंकर की जटाओं सा
वनस्पतियों की विविधता

अदृश्य शत्रु

चिड़ियों की चहचहाहट शांत है
शांत है कबूतर की गुटर गूं गूं

कोयल भी नहीं बोल रही

न कोई कव्वा

बच्चे भी बाहर नहीं खेलते

सन्नाटा पसरा है बाहर मैदान पर भी

केवल अफवाहों को हवा देती है
करोना संक्रमण की कुछ पस्त खबरें

एक डर फिर से फैल रहा है

फिर से बढ़ने लगी है

करोना की संक्रमण दर
सावधान रहें, आश्वस्त रहें

दुश्मन को फिर से परास्त करेंगें

हम सब मिलकर ।

नई पहचान

आओ फिर से मिलें

अनजान लोगों की तरह

एक दूसरे को जानने

की जिज्ञासा के साथ

वो पहले पहल मिलने की

ताजगी लिए हुए ।

बहुत सारे प्रश्नों को

मन ही मन दोहराते हुए

कंपकंपाते होंठों पर

दिल की धड़कनें लरजती सी

व्यक्त हो कर भी अव्यक्त सी

रह जाएं सुनकर भी अनसुनी सी

देखूं जी भरकर फिर भी अदेखा

रह जाएं तुम्हारे चेहरे का बांकपन

बार बार मिलने की इच्छा से

उदीप्त रहे आंखें

नींद उड़ जाएं और

तू ही तू नज़र आए ।

बहक जाऊं

चलो बहक जाऊं थोड़ा

हवा के संग संग

हो जाऊं थोड़ा आवारा

बिखर जाऊं थोड़ा सा

समेट लूं बदगुमानियां थोड़ी सी

धूप संग थोड़ा तप लूं

जुबान में टेढ़ापन

नीयत में पलट जाऊं

दोपहर सा जुलसाऊं

लूं की तरहां

सांझ संग अतरंगी

पी कर लड़खड़ा लूं थोड़ा

जी भर कर कोस लूं

ज़माने भर को

थोड़ा सा बदनाम हो जाऊं

उतार दूं भलेपन का लबादा

थोड़ा सा अंधेरे का हमनाम हो जाऊं

बहुत रह लिया सयाना बनकर

थोड़ा अनाड़ी हो कर ही

शायद उसे नजर आऊं।

जयघोष

अपने अपने घरों में बंद

जरुर हैं हम सब

पर अकेले नहीं हैं

इस लड़ाई में सब शामिल है

करोना की लड़ाई कुछ अलग है

अलगाव और एक दूसरे से दूरी बनाकर ही

इसे जीत पाएंगे हम ।

करोना ने एक नई पहचान दी है

दूरी और अलगाव को

पुराने और दकियानूसी कहे जाने वाले

कुछ संस्कार फिर प्रासंगिक हो उठे हैं

यह भारतीय संस्कृति का जयघोष है ।

पीड़

कितने ही पशु- पक्षियों को

तुम जीवित ही चबा गये

यौन शक्ति बढ़ाने के निमित्त

तुम पशुत्व से भी नीचे गिर गये ।

तुम्हारी पशुता को देने ज़बाब
प्रकृति ने किया है प्रहार

एक छोटा सा वायरस छोड़ दिया है

तुम्हारी औकात दिखाने के लिए

समझ सकते हो तो समझ जाओ

नहीं तो होगा सर्वनाश ।

एक डर

एक डर बज़बज़ा रहा है

सुनसान पड़ी सड़क पर

ना कोई आ रहा है

ना कोई जा रहा है

सूखे पत्ते हवा में

उड़ रहे हैं कभी इधर कभी उधर

बस उन्हीं की आवाज सुनाई देती है

इस उदास शाम के बीच

उतरती शाम के संग संग

उतर रही है लाकडाउन की छायाएं

मुंह ढांपकर अबोले से उतरते हैं

इक्का दुक्का छितराए से

दूरी बनाते ,बचते बचाते से लोग

अपार्टमेंट के बाहर खड़े हाकर से

फल सब्जी खरीदने ।

यूंही लोग हवा की तरह

बातों का रंग बदलते देखते है

साम्यवादी चीन की करतूत है ये

ना भाई ,ना

ये तो तब्लीग़ी जमात़ का करनामा है

बहस और आरोपों-प्रत्यारोपों के

टीवी कार्यक्रम से बाहर

हर व्यक्ति अकेला खड़ा है

लम्बी होती अपनी छाया के संग ।

शहर में अफवाहों का बाज़ार सजता है
व्हाट्स अप पर एक ग्रुप से

दूसरे ग्रुप तक सनसनी मचा कर

फल मत खरीदना उस दाढ़ी वाले से

जो बदनीयती का थूक लगाता है

बीमारी फैलाता है

धर्म की टोपी पहनकर

अधर्म का बाज़ार सजाता है ।

दुर्भावनावों की दुर्गंध से

बड़ी होती है सद्भावनाओं की सुगंध

हर कुत्सित इरादों को नाकाम कर

सदाशयता अपनी चाल चलती है

सहज ही जीवन सधे कदम चलता है

हर बीमारी के बाद

ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार चलती है

तमाम घबराहटों को नाकाम कर

करोना से आगे निकल ।