वनवास

बरसों बाद अचानक

तुम्हारी कापती सी आवाज

मेरे कानों में मिठास घोलती है ।

मैं तन्द्रा से जागा

पहचान ने का किया प्रयास

कौन हो तुम जानी पहचानी

क्यो चली गई थी

गुमनामी के अँधेरे में ।

कौन सी मजबूरिया थी

मेरे और तुम्हारे बीच

दीवार की तरह खड़ी हुई ।

कही गहरे से आती आवाज

अपने से ही टकराती हुई

मुझे झकझोर गयी ।

तुम हो मेरा ही अस्तित्व

पुनः प्राप्त ।

वनवास से लौट आई है

गहरे नील सागर में भटकती हुई

मेरी ही प्रतिछवि ।

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