राह और राही

तुम राह मैं राही

तुम्हारी ही तलाश में

भटका हुआ मैं

शहर की गलियों में

विस्मृति का दंश झेल रहा हूँ ।

तुम गतिमान समय की रेख सी

तुम को बाहों के आवृत्त में

घेरने को आतुर

दौड़ता रहा हूँ अधंकार के बियाबान में

अतृप्त….. दिशाहीन ……भ्रमित……।

3 विचार “राह और राही&rdquo पर;

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