यादें

धूप में फैला दिया है

कुछ सींंझी हुई यादों को

कि उनमें लौट आए

खनकती ताजगी ।

ओँस बूंदों सी झलमल लिए

कुछ नयी पुरानी यादें

अभी मैंने रखी संभाल

कविता की पुस्तक के बीच ।

फिर से लौट आओ ना

कि कुछ और जगह

खाली है यादों की कोठरी में ।

खनकते नोट सी हँसी

कानों में ढरक जाए

और चैन से मैं

निहार सकूं सूरजमुखी सा

तुम्हारा मुखमंडल ।

4 विचार “यादें&rdquo पर;

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