हताशा के बीच से

जब हम ट्रंप के आने की

खुशी को

राष्ट्रीय उत्सव की तरह मना रहे थे

पूर्वी दिल्ली में अलगाव वादी ताकतें ‌

खूनी खेल में लिप्त

मानवता के चेहरे पर कालिख पोत रही थी ।

पचास इंसानों की बेदर्द हत्या

सैकड़ों घायल

मकानों दुकानों कारों बाईकों के

जले हुए अवशेषों के बीच

फैल गया है सन्नाटा ।

पुलिसकर्मियों के बूटों की आवाज

कर्फ्यू की उद्घोषणा के बीच

दबी पड़ी है सिसकियां ,

मां बहनों के चीत्कार में

शर्मसार होती हुई

राखी टूटी पड़ी है ।

कुछ परिपक्व पत्रकार

टी वी कैमरों के सामने

इसके राजनैतिक निहितार्थ

पर नये से नये एंगल ढूंढ कर

मंत्रमुग्ध हो रहे हैं ।

कुछ डूबती पार्टियों को यहां

पुर्नजीवित होने के अवसर

नजर आ रहे हैं

इसलिए वे चीख चीखकर सत्ता पक्ष

की ओर अंगुली उठा रहे हैं ।

वे भीतर ही भीतर खुश हैं

लोग उनके मंतव्य को समझ पा रहे हैं

इसलिए हर फोरम पर

सरकार की धोती खींच रहें हैं

ताकि अफवाहों के बीच अव्यवस्था फैल जाए

और अगली बार हमारी सरकार बन जाए ।

कुत्सित मानसिकता से ऊपर उठकर

लोग खड़े हो रहे हैं फिर से

जीवन का नया गीत गाने के लिए

एक दूसरे के आंसू पोंछते हुए ।

कोई नहीं आएगा

हमें ही अपने आंगन को बुहारना है

फिर से एक दूसरे का हाथ थाम

घरों को रोशन करना है

अपनी अगली नस्लों के लिए ।

3 विचार “हताशा के बीच से&rdquo पर;

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s