धैर्य

सूर्योदय से सूर्यास्त तक

हमने हर रंग को जिया है

शुद्ध स्वच्छ निर्मल अमृतमयी हवा का

एक एक घूंट शांत मनोभाव से पिया है ।

लाकडाऊन की इस अभूतपूर्व घड़ी में

जब देश में भय और शंकाओं की घटा

अफवाहों के काले बादल घिर गए हैं

फिर भी धैर्य से देश एकजुट खड़ा है

हवा का रुख बदलने वाला है

सब एक ही गीत गा रहें हैं

हम होंगे कामयाब एक दिन

दुश्मनों की शैतानी चालों को

समझ लिया है हमने

मिलजुल कर हम हर मुसीबत से

टकरायेंगे और संकटों से बाहर आएंगे ।

अवसर

जब कऱोना से डर कर

घरों में दुबक गए हैं लोग

सरकारी आदेशों का लबादा ओढ़कर

तब मेरे जैसे कुछ लोग

शहर की सड़कों पर भागे फिर रहे हैं

सब्जियों की , फलों की, दूध की आपूर्ति करते हुए

हमें कोई डर नहीं डराता

भूख के डर से कोई डर बड़ा नहीं होता

भूख ने मुझे निडर बना दिया है ।

तुम दुबक सकते हो टीवी की रंगीन दुनिया में

विज्ञापनों की ईत्र से लकदक नायिका के सपनों के साथ

सरकारी आदेशों को तुमने अपनी सुविधा के लिए बुना है

तुम्हारे लिए चलती है मैट्रो और हवाई जहाज

मैं तो बस के लिए भी तरसाया जाता हूं

पर क्या मैं ठहरा हूं ?

मुझे अपने पैरों पर भरोसा है

मैं मीलों को दूरी को हवा की गति से उड़ता हूं

मरना तो है ही एक दिन

पर मैं चलते चलते ही मरूंगा

मैं अपने लिए नहीं तुम्हारे लिए मरूंगा ।

मेरी धोती और मेरी चादर ही मेरी पताका हैं

खुले आसमान के नीचे

तुम्हारे डर को एक अवसर मानकर

मैं निकल आया हूं

जीवन की उत्कट लालसा की पतवार थामकर

अंतिम लड़ाई के लिए तत्पर होकर

अगर विजयी हुआ तो तुम मुझे सलाम करोगे ।

स्वच्छ आकाश

बहुत दिनों बाद हुआ है

स्वच्छ नीला आकाश

हवा कितनी साफ साफ

जैसे सुगंध से भरी हो

धूप एकदम खिली खिली

सद्यस्नात नायिका के मुखमंडल सी

सब कुछ कितना निर्मल पारदर्शी

पेड़ कितने स्वच्छ जागे जागे से

बस निहारते ही रहे अपलक

पर हम इसे लाए नहीं

ये एक भय ,संशय और आतंक से जन्मा है ।

होली ये कैसी हो ली

देश जब वसंत के रंगों

में रंगा हुआ था

हर ओर रंगोत्सव चल रहा था

फूलों की खुशबू हर ओर छाई थी

हर मन प्रफुल्लित था होली नजदीक आई थी

गीत और संगीत की महफ़िल सजाने की तैयारी थी

तब दिल्ली में कुछ लोग नफरत की साज़िश में

दिन रात पत्थर , पैट्रोल बम,गोली बारूद सजा रहे थे

फिर खेला गया खूनी खेल

इंसानियत की अर्थी निकली

खेली खून की होली

मानवता हुई शर्मसार

गली गली फैला पडा़ है

नफरत का सामान

लंगड़ाती चल रही है जिंदगी

टूटी हुई बैशाखी के सहारे

कुछ है जो खो गया

नफरत की आग में

जलते मकानों दुकानों संग

टूटी हुई चारपाई , मेज,कुर्सी के पास

एक गमला भी टूटा है

जिस पर लिखा है विश्वास

फिर भी पौधे में निकल आई है

छोटी-छोटी क ई कलियां गुलाब की

फिर विश्वास की फसलें उगेगीं

फिर गली में उडे़गा गुलाल

फिर मन करेगा पड़ोसी को दुआ सलाम ।

हताशा के बीच से

जब हम ट्रंप के आने की

खुशी को

राष्ट्रीय उत्सव की तरह मना रहे थे

पूर्वी दिल्ली में अलगाव वादी ताकतें ‌

खूनी खेल में लिप्त

मानवता के चेहरे पर कालिख पोत रही थी ।

पचास इंसानों की बेदर्द हत्या

सैकड़ों घायल

मकानों दुकानों कारों बाईकों के

जले हुए अवशेषों के बीच

फैल गया है सन्नाटा ।

पुलिसकर्मियों के बूटों की आवाज

कर्फ्यू की उद्घोषणा के बीच

दबी पड़ी है सिसकियां ,

मां बहनों के चीत्कार में

शर्मसार होती हुई

राखी टूटी पड़ी है ।

कुछ परिपक्व पत्रकार

टी वी कैमरों के सामने

इसके राजनैतिक निहितार्थ

पर नये से नये एंगल ढूंढ कर

मंत्रमुग्ध हो रहे हैं ।

कुछ डूबती पार्टियों को यहां

पुर्नजीवित होने के अवसर

नजर आ रहे हैं

इसलिए वे चीख चीखकर सत्ता पक्ष

की ओर अंगुली उठा रहे हैं ।

वे भीतर ही भीतर खुश हैं

लोग उनके मंतव्य को समझ पा रहे हैं

इसलिए हर फोरम पर

सरकार की धोती खींच रहें हैं

ताकि अफवाहों के बीच अव्यवस्था फैल जाए

और अगली बार हमारी सरकार बन जाए ।

कुत्सित मानसिकता से ऊपर उठकर

लोग खड़े हो रहे हैं फिर से

जीवन का नया गीत गाने के लिए

एक दूसरे के आंसू पोंछते हुए ।

कोई नहीं आएगा

हमें ही अपने आंगन को बुहारना है

फिर से एक दूसरे का हाथ थाम

घरों को रोशन करना है

अपनी अगली नस्लों के लिए ।

चुनाव

राजनीति के अस्तबल में

गहरी हलचल है

गहमागहमी है

मुद्दे पर मुद्दे हुंकार भर रहे हैं ।

पदयात्रा में जय-जयकार है

रोड़ शो की हवा जोरदार है

रैली में भाषण धारदार है

कार्यकर्त्ता बड़े वफादार है

झंडे डंडे और हथकंडे सब की बहार है ।

हवा में शोर है

नेता बड़ा चोर है

दाम है तो काम है

सीधा सा फंडा है

वरना तो डंडा है

चेहरा शानदार है

पाकेट वजनदार है

नोट है तो वोट है

डंके की चोट है ।

जीत और हार में

एक ही बात है

पक्ष में विपक्ष में

होते सभी काम हैं

हर तरफ लूट है

बाकी सब झूठ है

वादे है इरादे है

पूरे हैं आधे है

नेक हैं अनेक हैं

घोषणाओं की रेल पेल है

रास्ते में मझधार में

नेता सदाबहार है ।

चुनने का संकट है

संकट पर संकट है

सोचकर विचार कर

राह की तलाश कर

सब तेरे साथ हैं

सब तेरे हाथ है

नारों की फुरफुरी से

ऊपर निकल कर

सत्य का संधान कर

चुनाव कर चुनाव कर

सही से चुनाव कर ।

भाव अभाव

शब्दों के कोश में

कसमसाते शब्द

अभिव्यक्ति के लिए बाट जोह रहे हैं ।

जो मैंने कहा वह

हवा में तैरता रहा

सम्प्रेषित नहीं हुआ ।

आंखें जो कह रही थी

वो होंठों ने कहा नहीं

कानों ने वो सुना

जो मैंनें कहा ही नहीं ।

यूंही इच्छित सुनने की प्रतीक्षा में

कब से खड़ा हूं ।

शब्दों के दूसरी तरफ खड़े

व्यक्ति के पास

असमंजस का पहाड़ा है।

भाव और अभाव की दुविधा में

घिरे हर व्यक्ति के पास

उलाहनों का अम्बार है ।

प्यार में विश्लेषण

तर्क का पैमाना

भाव का अभाव है ।

कानों में कोई निराश गीत

गूंज रहा है ।

मायानगरी १

हे उद्धव

दामोदर दास का साथ छोड़कर

वीर सावरकर की सौगंध भूलकर

कहां भटक गये हो ।

गोपियों और ग्वालबाल संग

जो प्रेम भक्ति का गीत गाया था

कहां बिसरा दिया वो