मायानगरी

हे उद्धव !

मायानगरी के सिंहासन के

मोहपाश में आबद्ध

तुम्हारी आंखों पर

कैसा आवृत है ये

कि तुम देवेन्द्र , नरेंद्र

कि सत्संगति और

शाह कीअमित

मंत्रणा का त्याग कर

शरद और सोनिया के

कुटिल कुचक्र में फंसे

जरासंध की सभा में

मिले सम्मान से इतरा रहे हो।

अनंत

खुले आसमान की ओर

निहारती है आंखें

दोनों हाथों से सम्पूर्ण आसमान को

घेर लेने की आकांक्षा से

हवा सी चंचलता से सरोबार

मैं कुछ नया नया सा

एक ताजा सा अनुभव समेट

लेना चाहता हूं ।

एक खालीपन ने

घेर लिया है

निरूत्तर सा

अबूझा सा

दिशाहीन सा

निशब्द सा

प्रश्नहीन सा

संकटग्रस्त सा

बस यूंही निहारता हूं

खुले आसमान को

जहां संभावनाओं की

अनंत खिड़कियां खुलती हैं

मेरे लिए भी खुली हो शायद ।

किसान

फूल की पंखुड़ियों की तरह

बिखर जाऊंगा रेशा रेशा

अपने खेत की मिट्टी में

मिल जाऊंगा खाद की तरह

रेत में रेत बन जाऊंगा ।

अपना शरीर को पसीने में

पानी पानी कर कर के

सूख जाऊंगा सूखे पत्ते सा

टूटकर बिखर जाऊंगा रेत सा ।

फिर नया अंकुर बन कर

तन खड़ा हो जाऊंगा

सारी खरपतवार के बीच से

सांस खींच कर लहलहा उठूंगा ।

चमचमाती फसल की चमक सा

खिलखिलाकर प्रकट हो जाऊंगा

अपने पिता -पितामह की तरह

राष्ट्र सेवा मानव सेवा के लिए उत्सर्ग हो जाऊंगा ।

बस …

बस यूहीं

निहारता रहा रास्तों की ओर

न उसने आना था

और ना आई

फिर भी

बस निहारता रहा ।

फोन पर

कई बार नजर डाली

लगता है कोई संदेश आएगा

बार बार देखा

बस यूहीं

लगता है जैसे अभी अभी

कोई संदेश आया है

पर नही आना था

नही आया ।

भादों की कड़कती धूप है

बादलों की चहलकदमी सी

बरसात की झड़ी सी

लगनी थी

नही लगी

सुबह से शाम होती रही

बस यूहीं

बेसबब बस इंतजार है ।

पहाड़ से नदी

पहाड़ से रिसती बूंद बूंद

बनते बनते बन गयी नदी

गर्जना करती

पहाडों से टकराती

अपना रास्ता बनाती

निरन्तर गतिमान है ।

पत्थरों ने सीख लिया

पानी बनकर बहना

गतिमान रहना

गति ही जीवन

स्थिर होना निरर्थक

ऊपर से कठोर पर्वत

भीतर से स्नेहासिक्त हो

द्रवित हो रहा है

बूंद बूंद बह रहा है ।

लय होने में उल्लास है

हास परिहास है

जीवन का गीत है

ऊर्जा है उमंग है

मधुर संगीत है

परिवर्तन है नर्तन है ।

गतिरोध

हवा के झोंके की तरह

सब कुछ ठहर सा गया है

पत्ता तक नहीं हिल रहा

बादल घिर गए

बिजली भी कड़की

पर बूंद तक ना गिरी

उमस से पसीने पसीने

बस …….बुरा हाल है ।

बस की इंतजार मे खड़ा हूँ

घंटों में एक आती है

ठसाठस भरी हुई

बड़ा ही मुश्किल है अंदर चढ पाना

गज़ब की धकामुकी से होकर अंदर पहुंच जाता हूँ

गर्दन उचकाकर गहरी सांस लेता हूँ

आधी लड़ाई जीत लेता हूँ

दफ्तर जाने की ।

चेहरा पोंछकर बालो को हाथों से संवारता हूँ

गहरी सांस लेकर आश्वस्त सा होता हूँ

शायद आज समय पर पहुंच जाउंगा

अफसर की चुभती नजरों से बच पाउगांं

पर बस तो रुक गई है

आगे बहुत जाम है

शहर तंग हाल है

सड़क छोटी लग रही है ।

आवाजें ही आवाजें सुनाई आ रही है

एक के उपर दूसरी आवाज छा रही हैं

ना सुर है न ताल है

बस बुरा हाल है

आवाजों के जंगल में

गुम होता जा रहा हूँ

मुझे सुनाई पड़ने लगी है

अफसर की झिड़कियाँ

नए नए संबोधन

गुम होता जा रहा है मेरा वजूद

न मैं यहाँ हूँ न वहाँ हूँ

न सुन पा रहा हूँ

न समझ पा रहा हूँ

असमंजस से घिरा हूँ

न ओर है न छोर है

बस गतिरोध ही गतिरोध है ।

हलचल

आसमान में हलचल

बादलों की आवाजाही चल रही है

काले भूरे छोटे मोटे लंबे पतले

बादल ही बादल हैं हर ओर

हजारों हजार आखें देखती है

उम्मीद लगाए निहार रहे हैं ।

बिना बरसें निकल गये बादल

आखों में अतृप्ति ठहर गयी है

नही हो पा रही है फसलों की बुआई

खेतों में खडे़ किसान

बस इंतजार…..

ठहरा सा गया है सपनों का सफर

सुना है अलनी़नो ने बादलों को रिझा लिया है

अलनीनो़ कातिल फि़ंरंगी नायिका ।

सफ़र

राह तकता रहा दिन बदलता रहा

पर तेरी चाहत का सफ़र बाकी है।

चला हूँ तेरी राहों में सालों साल

तुझ से उम्मीदों का सफ़र बाकी है।

बात चली चलती गयी मयखाने में

बातों का सिलसिला अभी बाकी है ।

उदास हूँ उदासियों ने घेर लिया

मुहब्बत की रौशनी का सफर बाकी है ।

खिड़कियाँ

खोल दो खिड़कियाँ

आने दो ताजी हवा

आसमान के खुलेपन को

समेटना है मुझे ।

आसमान से जुड़ी है

धरती पर फैली हरियाली

उर्ध्वमुखी ऊर्जा का वितान

मैं उसके स्पर्श पाश में आबद्ध हो

डूब जाना चाहता हूँ इस सुख सागर में ।

माँ

तुम समय के प्रवाह में

बह गयी हवा सी

मैं खडा़ निहारता रह गया

तुम अभी थी

अभी नही हो

निश्चेष्ट तुम्हारी देह

प्राण तत्व निकल गया

किसी अंजान यात्रा पर ।

माँ ,……।माँ ,….।।

मैं पुकारता रह गया

खाली हाथ खडा़ रह गया

कुछ समझ नही पा रहा हूँ

करूँ तो क्या करूं

दिशाहीन सा भ्रमित सा ।

क्रियाक्रम की रस्में निभाकर

सगे संबधियों के बीच

अकेला सा, खोया खोया सा

खड़ा हूँ

धीरे धीरे सब लौट गये हैं

सन्नाटा है घर मैं ।

माँ मुझे घर में हर ओर दिखती है

माँ मेरे विचारों में विद्यमान

माँ मेरे अस्तित्व का हिस्सा

माँ है तो मैं हूँ ।