वृक्ष

वो शानदार लग रहा है

हमारे घर के सामने अपनी

शाखाएँ फैला कर खड़ा है

हर आने जाने वाले के स्वागत में

अपनी टहनी हिलाकर सरसराता है ।

मैं उस की छाया में

खेला हूँ बचपन के खेल

उसके तने से लिपट कर

अपनी भुजाओ का विस्तार नापा है ।

उसके बौर की सुगंध में

हो गया हूँ सरोबार

उसके फलों का लिया है आस्वाद

मधु रितु में बहका हूँ उसके साथ

वो मेरा सखा है मेरा पालक है ।

वो मुझे निहारता है मैं उसे

उसने हमारी कई पीढ़ियों को

देखा और जाना है ।

वो झेलता रहा मौसमो की मार

सारा विष स्वमं पी गया

हमें देता है जीवनदान

कहीं गहरे से जीवन रस खींचकर

हमारी नस नस में कर रहा है प्रवाहित ।

तू शक्तिमान तू कालकूट

तू परोपकार का मूर्त रूप

तू दाता निराभिमानी

तू माँ सदृश हृदय सिक्त ।

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